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Married men more prone to suicide: Study

Posted by iluvshrutiverma on February 27, 2010

Married men more prone to suicide: Study

February 27th, 2010

It’s not just women who go through trauma as a result of bad marriages. Men suffer just as much, but silently. Recent data made public by the National Crime Record Bureau (NCRB) points out that one married man in India is committing suicide every nine minutes. According to the survey, the cause may vary from personal problems and marital issues to economic pressures. It’s clear that many men are agonising internally over failed marriages.

Psychologist Sridevi S says it’s because men are not as expressive as women and bottle their feelings. “Women have been nurtured from the time they are young into believing that they can surmount problems. But on the other hand men are told not to cry and express emotions in public, so they suppress all their troubles until it overwhelms them and they feel they can’t take it any more.” She continues, “The sudden increase in suicidal tendencies among men is also because earlier women took care of all the family issues, but today, both husband and wife are working, they deal with it together. So men find it difficult to balance home as well as work.” The survey points out that compared to women, men are a greater suicide risk, with a male-female ratio of 64:36.

Suresh Ram, Convener, Save Indian Family movement, TN, says that this could be the result of pro-women Indian laws. “There are several laws in our country which protect women, while men have no such protection. Often women take advantage of it. There is this stereotype attached to men, that they should not cry or express their depression. Why is it,” he questions, “that when a man commits suicide he is called coward, while when a woman does so, they say she is driven to it-” he asks.

Actor Srikanth says,”Being a married man could be a little stressful today, but you must understand that there is a woman in your life who is also going through the same.”

http://www.deccanch ronicle.com/ tabloids/ married-men- more-prone- suicide-study- 634

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पत्नियों से ज्यादा पीड़ित पति

Posted by iluvshrutiverma on November 21, 2009

Commando Rajesh Vakaria from Nagpur is in news again.

Earlier it was the following video:

This time it is the following article:

http://www.visfot.com/index.php/news_never_die/2038.html

अभी तक ज्यादातर महिलाओं पर अत्याचार के मामले सामने आते रहे हैं। इसे रोकने के लिए सशक्त कानून भी बनाए गए हैं। समय बदल रहा है। महिला सशक्तिकरण के जमाने में अब पति पत्नी से पीडि़त हैं। चाहे वे पत्नी के लगाए गए दहेज प्रताडऩा और घरेलू हिंसा के झूठे आरोप हों या फिर घर में आपसी कलह। पत्नी पीिड़ता कहां जाए? न कोई हमदर्दी न कोई सरकारी मदद। नतीजा? पीड़ित पतियों के आत्महत्या का अनुपात पीड़ित पत्नियों से दोगुना है.

इस तथ्य पर बाद में आते हैं लेकिन पहले आपको यह बताते हैं कि 19 नंवबर को तंग पति अंतरराष्ट्रीय पति दिवस के रूप में मनाते हैं। पार्टी करके। बैठक करके। फिल्म देखकर। कुछ पीड़ितों का समूहिक पिकनिक मनाकर एक दिन खुशियों को जी रहे हैं। अपने लिए शायद वैसा दिन पत्नी के साथ फिर कभी नहीं जी पाएंगे। हकीकत बदल रही है। यकीन मानिये जितनी हिंसा महिलाओं के साथ हो रही है, वैसी ही हिंसा पुरुषों के साथ हो रही है। दो वर्ग बन गए हैं। एक ओर जहां पति पत्नी को पीटता है, वहीं दूसरे वर्ग में पत्नी से पति पीडित होकर दिल में टीस लिए जिंदगी से हर आस छोड़ रहा है।

पहली बार त्रिनिदाद और टोबैगो में 1999 में 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के रूप में मनाया गया। भारत में इसी शुरुआत 2007 से हुई। पत्नी से प्रताडि़त होने के मामले में देश का कोई शहर अछूता नहीं है। बस अंतर इतना है कि महिलाओं से जुड़ी हिंसा को मीडिया ज्यादा कवरेज देता है। पीड़ित पति शर्म संकोच से कहीं नही जाते हैं। करीब डेढ़ दशक पूर्व दिल्ली के विभिन्न इलाकों में कई जगह लिखा हुआ मिलता था – पत्नी सताएं तो हमे बताएं, मिले नहीं लिखें। अब वो तख्ती तो नहीं दिखती है, लेकिन पीड़ित बढ़ गए हैं.

आए दिन शादीशुदा पुरुषों की आत्महत्या के मामले प्रकाश में आते हैं। पर इसके पीछे की सच्चाई से बहुत कम ही लोग ही रू-ब-रू हो पाते हैं। कई बार इन कानूनों का दुरुपयोग कर पत्नी पति को प्रताड़ित करती है। इससे तंग आकर अनेक लोगों ने आत्महत्या की राह चुनी है।

वर्षों गुजर गए। पत्नी पीड़ितों के समूह ने संगठित होकर सरकार से लगातार संघर्ष कर देहज उत्पीडन के कानून 498-ए में बदलाव कर इस जमानती बनाने की मांग कर रहा है। बदलाव के लिए सरकार विचार कर रही है। संगठन अलग पुरुष कल्याण मंत्रालय की मांग कर रहे हैं। पुरुषों के पक्ष में दस्ताबेज जुगाड़ कर सरकार के पास ज्ञापन भेजकर लगातार दवाब बना रहे हैं। कई शहरों में पत्नी पीडि़तों का समूह कही चुपचाप तो कहीं खुलेआम बैठक करते हैं। एक-दूसरे की समस्या सुनते हैं और सहयोग करते हैं। जब नया पीड़ित आता है तो उनकी काउंसलिंग होती है जिससे कि वह आत्महत्या न कर सके।

पत्नी पीड़ित राजेश बखारिया दहेज उत्पीडऩ कानून के चक्कर में वर्षों से कोर्ट के चक्कर काटते-काटते इस अपने जैसे दूसरे पीड़ितों का दु:ख दर्द बांटते हैं। सहयोग करते हैं। कहते हैं कि अब तो नई नवेली दुलहन भी छोटी-छोटी बात पर दहेज विरोधी काननू का हवाला देकर घर-परिवार में वर्चस्व जमाने की कोशिश करती हैं। खेद की बात है कि जैसे ही पत्नी आरोप लगाती है और बात थाने तक पहुंचती है और मामला दर्ज होता है तो पति को जेल जाना पड़ता है। वह घोर अवसाद का शिकार हो जाता है। पत्नी की हरकतों से बेटे-भाई की जिंदगी में पडऩे वाली खलल से कई मां-बहनों का दिल टूटा है। युवा पति कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते-काटते अधेड़ हो रहे हैं। लिहाजा, इस चक्कर में पड़े अधिकतर लोग आत्महत्या को अंतिम विकल्प मान लेते हैं। क्योंकि जैसे ही पत्नी के अरोप पुलिस दर्ज करती है, नौकरी चाहे सरकारी हो या निजी चली जाती है।

श्रम और रोजगार मंत्रालय के वर्ष 2001-05 के जारी आंकड़ों के मुताबिक निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों से करीब 14 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। कई सर्वे व जांच में यह बात सामने आ चुकी है कि आईपीसी की धारा 498 ए का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। इसके तहत कई पतियों पर दहेज के लिए पत्नी को प्रताड़ित करने के झूठे अरोप लगे हैं। दो साल पूर्व लागू घरेलू हिंसा उन्नमूलन कानून 2005 से तो महिलाओं को और ताकत दे दी है। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2006 में एक सिविल याचिका 583 में यह टिप्पणी की थी कि इस कानून को तैयार करते समय कई खामियां रह गई हैं। उन खामियों का फायदा उठा कर कई पत्नियां पति को धमका रही हैं। उन्होंने बताया कि आंकड़े देखें तो औसतन जहां हर 19 मिनट में देश में किसी व्यक्ति की हत्या होती है, वहीं हर 10 मिनट में एक विवाहित व्यक्ति आत्महत्या करता है। वर्ष 2005-07 के आंकड़ों के मुताबिक दहेज उत्पीडऩ मामले में कानून की धारा 498-ए, के तहत 1,39,058 मामले दर्ज हुए।

पत्नी पीड़ितों की एक संस्था सेव इंडिया फैमिली फउंडेशन पत्नी पीड़ितों को काउंसलिंग से मामले सुलझाने की कोशिश करता है। फाउंडेशन सरकार पर लगातार स्वतंत्र रूप से पुरुष कल्याण मंत्रालय बनाने की मांग कर रहा है। श्री बखारिया का कहना है कि यदि पत्नी किसी भी कारण से आत्महत्या करती है तो पुलिस तुरंत केस दर्ज कर आरोपियों को हवालात में ले लेती है। घर घरेलू कलह से तंग आकर पति आत्महत्या करता है तो पत्नी से पूछताछ तक नहीं होती है। पत्नी के प्रताड़ित करने के अधिकतर मामले साल 2000 से तेजी से बढ़े हैं। इसका प्रमुख जिम्मेदार टीवी पर प्रसारित होने वाले कुछ धारावाहिक हैं जिनकी अनाप-शनाप कहानी में नकारात्मक छवि वाली महिला पात्रों ने समाज में गलत असर छोड़ा है। लड़कों वालों में वधु पक्ष के परिवार के अनावश्यक हस्तक्षेप बढ़ा है जिससे महिलाओं में अहम आ जाता है।

देश में आत्महत्या के मामले वर्ष 2005-07
विवाहित पुरुष    विवाहित महिलाएं
1,65,528      88,128

आत्महत्या का अनुपात प्रतिशत
विवाहित पुरुष    विवाहित महिलाएं
65.25           34.75

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Men are more emotional than women

Posted by iluvshrutiverma on November 21, 2009

http://www.siliconindia.com/shownews/Men_are_more_emotional_than_women-nid-63125.html

Bangalore: Tying the knot makes men feel happy to the worth of 18,000 pounds while women experience the joy worth only half the amount.

Paul Frijters, Queensland University of Technology, estimated the value of happiness in terms of cash for the major events in life like marriage, divorce and illness. Each of the event shows different results for men and women.
While divorce leave men feeling a loss of 61,500 pounds, for women it was a just a loss of 5,000 pounds.
The birth of a child created a low cash amount, about 18,000 pounds for a man and less than 5,000 pounds for a woman.
According to the findings, the death of a partner or a child creates the feeling of a loss of 73,000 pounds to a woman and more than 350,000 pounds to a man.
Losing a loved one has a much bigger effect than gaining a loved one. There’s an asymmetry between life and death. This shouldn’t surprise us. Human beings seem to notice losses more than gains.

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